Sixth lesson of shrimadbhagwad Geeta.

छठे अध्याय का सबसे अच्छा श्लोक आपको कौन सा लगता है?उसकी विवेचना करें।

छठे अध्याय का सबसे अच्छा श्लोक हमें यह लगता है-जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।

Jitatmanah prashantashya parmatma samahitah.Shitoshnasukhdukheshu tatha manapamanayoh..7..

जिसके अन्तःकरण की सारी वृत्तियां समाप्त हो गई है और जिसने साधना से अपने शरीर को साध लिया है ।जिसे ठंढ का आभास नहीं होता है।जिसे गर्मी का आभास नहीं होता है। जो मान में भी और अपमान में भी एक समान रहता है वही योगी है सुख में भी और दुख में भी एक समान रहता है वही योगी है ऐसी आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में परमात्मा सदा स्थित रहते हैं अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ नहीं होता है।

ऐसे पुरुष को महा ज्ञानी कहा जा सकता है और उसे अपनी आत्मा को और मन को जीतने वाला कहा जा सकता है। क्रियायोग में ऐसे महापुरुष के लिए विशेष साधन मार्ग की व्यवस्था है। ऐसे पुरुष यथा शीघ्र ही योग को प्राप्त हो जाते हैं और श्रीकृष्ण से उनका सायुज्य स्थापित हो जाता है। ऐसे ही पुरुष युग सिद्धि को प्राप्त करते हैं और उसे योग सिद्ध व्यक्ति कहा जाता है।

समरस मानव।

Here Shrikrishna describes about the yogsiddh man.A man who has got the God doesn’t cry for any thing.Such kind of man doesnever feel cold and hot.Never feel joy and sorrow.Such kind of person is the winner of his soul.He know everything about the soul.

For him shrikrishna uses a sanskruit word that is Jitatmanah.They who is the winner of their sentiments.(donot copy the linking because this is the wisdom property of global yoggeeta/sumanjee)